बहुचर्चित ‘शालार्थ आईडी घोटाला’ जांच पर ही सवालिया निशान!
विद्यमान बोर्ड अध्यक्ष के कार्यकाल की 400 फाइलें रडार पर, जांच की कमान भी उन्हीं के हाथ में
*Jyotsna Wankhede*:
पिछले कई सालों से खींच रहे नागपुर विभागीय बहुचर्चित शालार्थ आईडी प्रकरण ने एक बार फिर शिक्षा विभाग में हलचल मचा दी है। शिक्षण आयुक्त ने नागपुर विभाग के करीब 1357 शिक्षकों और शिक्षकेतर कर्मचारियों की नियुक्तियों की चौकशी करने का आदेश दिया है, लेकिन यह चौकशी समिति के प्रमुख यानी विद्यमान नागपुर विभागीय बोर्ड के अध्यक्ष के हाथों ही करवाई जा रही है। इसलिए, चौकशी की जवाबदारी सौंपी गई इनके के कार्यकाल में ही बहुत सारी फाइलें इस प्रकरण से संबंधित होने की जानकारी सामने आने से चौकशी की निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह निर्माण हो रहा है।
शिक्षण आयुक्त ने चौकशी के लिए 1357 शिक्षकों और शिक्षकेतर कर्मचारियों के व्यक्तिगत अभिलेखों की जांच के आदेश दिए हैं। संशयास्पद नियुक्तियों को दी गई वैधता मान्यता, संबंधित संस्था, नियुक्ति आदेश और अन्य आवश्यक कागजातों की जांच इस चौकशी में की जानी है। इसलिए केवल संबंधित शिक्षक-शिक्षकेतर कर्मचारियों की नियुक्ति ही नहीं, बल्कि उन नियुक्तियों को मान्यता देने की संपूर्ण प्रशासनिक प्रक्रिया और उसमें हुई गलतियों की भी जांच होनी है। खास बात यह है कि इन नियुक्तियों के काल में प्रशासनिक निर्णय लेने वाले तत्कालीन शिक्षा अधिकारी, शिक्षण उपसंचालक और अन्य संबंधित अधिकारी ही चौकशी के दायरे में हैं। इसलिए चौकशी का दायरा बड़ा है, और नियुक्तियों को मान्यता देने में किस स्तर पर निर्णय लिया गया, किसकी भूमिका रही, किसने नियमों का उल्लंघन किया और नियमों का पालन हुआ या नहीं, इसकी जांच करना भी महत्वपूर्ण होगा। लेकिन, इस जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा विद्यमान बोर्ड अध्यक्ष की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
विशेषत: इनके के कार्यकाल में लगभग 400 फाइलें चौकशी के दायरे में होने की जानकारी विश्वसनीय सूत्रों से मिली है, तो इन फाइलों की जांच को विशेष महत्व प्राप्त है। इन फाइलों में किसकी नियुक्तियों को मान्यता दी गई, उस समय कौन अधिकारी कार्यरत था, निर्णय प्रक्रिया किसकी स्वीकृति से हुई और उसके बाद नियुक्ति के स्थान पर बदलाव कैसे किया गया, इसकी विस्तृत चौकशी स्पष्ट होना आवश्यक है। 1357 प्रकरणों में से 400 फाइलें और चौकशी का नेतृत्व करने वाले विद्यमान बोर्ड अध्यक्ष, इस त्रिकोण के कारण शिक्षा विभाग में शालार्थ प्रकरण फिर से चर्चा में आया है। चौकशी समिति के प्रमुख पद पर इनकी नियुक्ति करना, क्या पूर्व की कार्यप्रणाली से संबंधित फाइलों पर विचार किया गया था, इसका जवाब अब महत्वपूर्ण होगा।
इन्होने 2016 से 2019 तक कालावधी में नागपुर जिला परिषद माध्यमिक शिक्षण विभाग में शिक्षणाधिकारी के तौर पर कार्य किया था। इस कार्यकाल में संबंधित शालार्थ प्रकरण की लगभग 400 फाइलें होने की जानकारी विश्वसनीय सूत्रों से मिली है। इन फाइलों में संशयास्पद नियुक्तियों को मान्यता देने के साथ-साथ प्रशासनिक प्रक्रिया के कागजात शामिल होने की बात सामने आई है। इसलिए अकेले इनके कार्यकाल में हुए फाइलों की चौकशी होने और दूसरी तरफ चौकशी समिति के प्रमुख के तौर पर इनके ही फाइलों की छानबीन करने से ऐसी स्थिति बन गई है कि कालखंड में लिए गए निर्णयों की जांच होने वाली है, उसमें कार्यरत संबंधित अधिकारी के नेतृत्व में होने के कारण प्रशासनिक निष्पक्षता पर ही सवालिया निशान खड़ा हो रहा है। इस चौकशी में इनकी कार्यकाल में हुई नियुक्तियों के साथ-साथ उस कालखंड की फाइलों की जांच किस पद्धति से होगी, संबंधित अधिकारियों की भूमिका स्वतंत्र रूप से जांची जानी चाहिए और प्रशासन की प्रशासनिक प्रक्रिया के कागजात अलग से जांचे जाने चाहिए। इसलिए अकेले के कार्यकाल से संबंधित फाइलों की चौकशी होने और दूसरी तरफ चौकशी समिति के प्रमुख के तौर पर इनके ही नेतृत्व करने से प्रशासनिक निष्पक्षता पर ही सवालिया निशान खड़ा हो रहा है।
शालार्थ आईडी के माध्यम से पात्रता न होने के बावजूद नियुक्तियां देकर प्रणाली में स्थान पाना, नियुक्ति देना और नियुक्ति की वैधता मान्यता देना, नियमों का पालन हुआ या नहीं, कागजातों की पड़ताल कैसी हुई और संपूर्ण प्रक्रिया में किसकी जिम्मेदारी थी, यह शोध का विषय है और चौकशी का मूल उद्देश्य भी यही है। इसलिए चौकशी केवल 1357 शिक्षक-कर्मचारियों की नियुक्ति तक सीमित न रहकर उन नियुक्तियों को प्रशासनिक मान्यता देने वाले तंत्र तक पहुंचनी अपेक्षित है।