*मुद्रांक विक्रेता हैं ‘लोकसेवक’; सर्वोच्च न्यायालय का फैसला, स्टैम्प पेपर बिक्री में रिश्वत लेने पर होगी कार्रवाई*
*ज्योत्स्ना वानखेडे*:
भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत मुद्रांक (स्टैम्प पेपर) विक्रेता ‘लोकसेवक’ की श्रेणी में आते हैं। इसलिए स्टैम्प पेपर बिक्री करते समय अधिक पैसे की मांग करना या रिश्वत लेना भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत उनके खिलाफ कार्रवाई की जा सके, ऐसा निर्णय सर्वोच्च न्यायालय ने दिया है।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की खंडपीठ ने यह निर्णय दिया। भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत परिभाषित लोकसेवक की श्रेणी में मुद्रांक विक्रेता आते हैं या नहीं, यह तय करने के लिए एक मामला खंडपीठ के सामने था। कर्तव्य का स्वरूप अत्यंत महत्वपूर्ण है, ऐसा न्यायालय ने कहा। देशभर में स्टैम्प विक्रेता महत्वपूर्ण सार्वजनिक कर्तव्य निभाते हैं।
कर्तव्य का पालन करने पर सरकार द्वारा उन्हें मेहनताना दिया जाता है। इसलिए, स्टैम्प पेपर विक्रेता निःसंदेह भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा 2(सी)(i) के अनुसार लोकसेवक हैं, ऐसा निर्णय खंडपीठ ने दिया।
कायम ठहराया था। कनिष्ठ न्यायालय ने याचिकाकर्ता को भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा 7 और 13(1)(डी) सह धारा 13(2) के तहत दोषी ठहराया था। याचिकाकर्ता स्टैम्प विक्रेता है। उसने 10 रुपये के स्टैम्प पेपर के लिए 2 रुपये ज्यादा मांगे थे। खरीदार द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर, लाचलुचपत प्रतिबंधक विभाग ने ‘ट्रैप’ बिछाकर आरोपी को रंगे हाथों पकड़ लिया। इसके बाद न्यायालय ने उसे कनिष्ठ दोषी ठहराया।
याचिकाकर्ता ने खारीज किया कि वह सरकारी कर्मचारी नहीं है, ऐसा उसका वकील ने तर्क दिया। इस प्रकरण की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने गुजरात राज्य विरुद्ध मनसुखभाई कांजीभाई शाह मामले के फैसले का संदर्भ दिया।
*हाईकोर्ट का फैसला कायम रखा*
मुद्रांक कागज की बिक्री से संबंधित निर्णय में दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को दोषी ठहराते हुए फैसला दिया था। विक्रेता सरकार द्वारा तय की गई दर पर स्टैम्प पेपर बेचता है, उसने ली गई रकम के बदले में कमीशन मिलता है। इसलिए, स्टैम्प पेपर की बिक्री करना एक सार्वजनिक कर्तव्य है।
इस प्रकरण में याचिकाकर्ता तथाकथित उपलब्ध सरकारी स्टैम्प पेपर खरीदकर सरकारी दर पर ही बेचता था, यह स्पष्ट है। ही सूट राज्य सरकार द्वारा तैयार किए गए 1938 के नियमों से जुड़ी हुई है और उसके तहत नियंत्रित की जाती है। इसलिए याचिकाकर्ता को अधिवक्ता नहीं मानना चाहिए, ऐसा न्यायालय ने कहा।
दिल्ली उच्च न्यायालय का निर्णय कायम रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने स्टैम्प पेपर विक्रेता को दोषी ठहराया।
*ऐसा है प्रकरण*
दिल्ली के एक स्टैम्प पेपर विक्रेता की याचिका पर खंडपीठ सुनवाई कर रही थी। दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को याचिकाकर्ता ने चुनौती दी थी। उच्च न्यायालय ने कनिष्ठ न्यायालय का निर्णय कायम रखा था।